Vijñāna Bhairava Tantra · 1.59

Vijñāna Bhairava Tantra 1.59

1.59
नित्ये विभौ निराधारे व्यापके चाखिलात्मनि । इति भैरवमनुस्मरन्पुमान्मुच्यते ॥५९॥
nitye vibhau nirādhāre vyāpake cākhilātmani | iti bhairavam anusmaran pumān mucyate
anuṣṭubh (irregular)
— नित्य में (अधिकरण कारक) ; — विभु (व्यापक) में (अधिकरण कारक) ; — निराधार में (अधिकरण कारक) ; — व्यापक में (अधिकरण कारक) ; — और (अव्यय) ; — अखिल-आत्मा में (अधिकरण — समासगत) ; — इस प्रकार भैरव को (कर्म कारक + अव्यय) ; — अनुस्मरण करता हुआ (वर्तमान कृदन्त) ; — पुरुष मुक्त हो जाता है — कर्ता + कर्मवाच्य वर्तमान

नित्य, विभु (व्यापक), निराधार, सर्वव्यापी, अखिल-आत्मा (सब का आत्म-स्वरूप) — इस प्रकार भैरव का अनुस्मरण करने वाला पुरुष मुक्त हो जाता है। (धारणा ४१)