— नित्य में (अधिकरण कारक); — विभु (व्यापक) में (अधिकरण कारक); — निराधार में (अधिकरण कारक); — व्यापक में (अधिकरण कारक); — और (अव्यय); — अखिल-आत्मा में (अधिकरण — समासगत); — इस प्रकार भैरव को (कर्म कारक + अव्यय); — अनुस्मरण करता हुआ (वर्तमान कृदन्त); — पुरुष मुक्त हो जाता है — कर्ता + कर्मवाच्य वर्तमान
नित्य, विभु (व्यापक), निराधार, सर्वव्यापी, अखिल-आत्मा (सब का आत्म-स्वरूप) — इस प्रकार भैरव का अनुस्मरण करने वाला पुरुष मुक्त हो जाता है। (धारणा ४१)