Vijñāna Bhairava Tantra · 1.58

Vijñāna Bhairava Tantra 1.58

1.58
यदवेद्यं यदग्राह्यं यच्छून्यं यदभावगम् । तत्सर्वं भैरवं भाव्यं तदन्ते बोधसम्भवः ॥५८॥
yad avedyaṃ yad agrāhyaṃ yac chūnyaṃ yad abhāvagam | tat sarvaṃ bhairavaṃ bhāvyaṃ tadante bodhasambhavaḥ
anuṣṭubh
— जो अवेद्य, ज्ञेय नहीं (सम्बन्धवाचक + विशेषण) ; — जो अग्राह्य, ग्रहण-योग्य नहीं (सम्बन्धवाचक + विशेषण) ; — जो शून्य (सम्बन्धवाचक + विशेषण) ; — जो अभाव-गत, अभाव में स्थित (सम्बन्धवाचक + विशेषण — समासगत) ; — वह सब भैरव-स्वरूप (कर्म कारक नपुंसक) ; — भावना-योग्य (विशेषण) ; — उसके अन्त में (अधिकरण — समासगत) ; — बोध (की) सम्भावना — कर्ता कारक — समासगत

जो अवेद्य (ज्ञेय नहीं) है, जो अग्राह्य है, जो शून्य है, और जो अभाव-गत है — वह सब भैरव-स्वरूप भावना के योग्य है; उसके अन्त में बोध (की) सम्भावना (होती है)। (धारणा ४०)