Vijñāna Bhairava Tantra · 1.57

Vijñāna Bhairava Tantra 1.57

1.57
न द्वेषं भावयेत्क्वापि न रागं भावयेत्क्वचित् । रागद्वेषविनिर्मुक्तौ मध्ये ब्रह्म प्रसर्पति ॥५७॥
na dveṣaṃ bhāvayet kvāpi na rāgaṃ bhāvayet kvacit | rāgadveṣavinirmuktau madhye brahma prasarpati
anuṣṭubh
— द्वेष नहीं (कर्म कारक) ; — भावना करे (विधि लिङ्) ; — कहीं भी (अव्यय-युग्म) ; — राग नहीं (कर्म कारक) ; — भावना करे (विधि लिङ्) ; — कहीं भी (अव्यय) ; — राग-द्वेष से विमुक्त होने पर (अधिकरण — समासगत) ; — मध्य में ब्रह्म (अधिकरण + कर्ता) ; — प्रसरित होता है, प्रसर्पण करता है (वर्तमान)

न कहीं द्वेष की भावना करे, न कहीं राग की; राग-द्वेष से विमुक्त होने पर मध्य में ब्रह्म प्रसरित होता है। (धारणा ३९)