न द्वेषं भावयेत्क्वापि न रागं भावयेत्क्वचित् ।
रागद्वेषविनिर्मुक्तौ मध्ये ब्रह्म प्रसर्पति ॥५७॥
na dveṣaṃ bhāvayet kvāpi na rāgaṃ bhāvayet kvacit |
rāgadveṣavinirmuktau madhye brahma prasarpati
anuṣṭubh
— द्वेष नहीं (कर्म कारक); — भावना करे (विधि लिङ्); — कहीं भी (अव्यय-युग्म); — राग नहीं (कर्म कारक); — भावना करे (विधि लिङ्); — कहीं भी (अव्यय); — राग-द्वेष से विमुक्त होने पर (अधिकरण — समासगत); — मध्य में ब्रह्म (अधिकरण + कर्ता); — प्रसरित होता है, प्रसर्पण करता है (वर्तमान)
न कहीं द्वेष की भावना करे, न कहीं राग की; राग-द्वेष से विमुक्त होने पर मध्य में ब्रह्म प्रसरित होता है। (धारणा ३९)