समः शत्रौ च मित्रे च समो मानावमानयोः ।
ब्रह्मणः परिपूर्णत्वादिति ज्ञात्वा सुखी भवेत् ॥५६॥
samaḥ śatrau ca mitre ca samo mānāvamānayoḥ |
brahmaṇaḥ paripūrṇatvād iti jñātvā sukhī bhavet
anuṣṭubh
— समान (कर्ता कारक); — शत्रु और मित्र में (अधिकरण कारक); — मान-अपमान में समान (अधिकरण द्विवचन — समासगत); — ब्रह्म की परिपूर्णता के कारण (अपादान — समासगत); — ऐसा जानकर (अव्यय + क्त्वान्त); — सुखी हो जाता है (कर्ता + विधि लिङ्)
शत्रु और मित्र में समान, मान और अपमान में समान — ब्रह्म की परिपूर्णता के कारण ऐसा जानकर साधक सुखी हो जाता है। (धारणा ३८)