Vijñāna Bhairava Tantra · 1.55

Vijñāna Bhairava Tantra 1.55

1.55
सर्वत्र भैरवो भावः सामान्येष्वपि गोचरः । न च तद्व्यतिरेकेण परोऽस्तीत्यद्वया गतिः ॥५५॥
sarvatra bhairavo bhāvaḥ sāmānyeṣv api gocaraḥ | na ca tadvyatirekeṇa paro'stīty advayā gatiḥ
anuṣṭubh
— सर्वत्र (अव्यय) ; — भैरव-स्वरूप भाव (कर्ता कारक) ; — सामान्य (साधारण) वस्तुओं में (अधिकरण बहुवचन) ; — भी (अव्यय) ; — गोचर, ज्ञान-विषय (कर्ता कारक) ; — और नहीं (अव्यय-युग्म) ; — उससे भिन्न होकर (करण कारक — समासगत) ; — अन्य कुछ है — इस प्रकार (कर्ता कारक + अव्यय) ; — अद्वैत-गति, अद्वैत-मार्ग (कर्ता कारक स्त्रीलिङ्ग)

सर्वत्र भैरव ही भाव (तत्त्व) है; सामान्य वस्तुओं में भी (वही) गोचर है; और उससे भिन्न अन्य कुछ नहीं है — यही अद्वैत-गति (अद्वैत-मार्ग) है। (धारणा ३७)