Vijñāna Bhairava Tantra · 1.65

Vijñāna Bhairava Tantra 1.65

1.65
आसने शयने स्थित्वा निराधारं विभावयन् । स्वदेहं मनसि क्षीणे क्षणात्क्षीणाशयो भवेत् ॥६५॥
āsane śayane sthitvā nirādhāraṃ vibhāvayan | svadehaṃ manasi kṣīṇe kṣaṇāt kṣīṇāśayo bhavet
anuṣṭubh
— आसन पर अथवा शय्या पर (अधिकरण द्विवचन) ; — बैठकर (क्त्वान्त) ; — निराधार (कर्म कारक) ; — भावना करता हुआ (वर्तमान कृदन्त — णिजन्त) ; — अपने देह को (कर्म — समासगत) ; — मन के क्षीण हो जाने पर (सति-सप्तमी) ; — क्षण-भर में (अव्यय) ; — क्षीण-आशय (वासना-मुक्त) हो जाता है — कर्ता + विधि लिङ्

आसन पर या शय्या पर बैठकर अपने शरीर को निराधार (आधारहीन) भावना करे; जब मन क्षीण हो जाए, तब क्षण-भर में क्षीण-आशय (वासना-मुक्त) हो जाता है। (धारणा ४७)