— आसन पर अथवा शय्या पर (अधिकरण द्विवचन); — बैठकर (क्त्वान्त); — निराधार (कर्म कारक); — भावना करता हुआ (वर्तमान कृदन्त — णिजन्त); — अपने देह को (कर्म — समासगत); — मन के क्षीण हो जाने पर (सति-सप्तमी); — क्षण-भर में (अव्यय); — क्षीण-आशय (वासना-मुक्त) हो जाता है — कर्ता + विधि लिङ्
आसन पर या शय्या पर बैठकर अपने शरीर को निराधार (आधारहीन) भावना करे; जब मन क्षीण हो जाए, तब क्षण-भर में क्षीण-आशय (वासना-मुक्त) हो जाता है। (धारणा ४७)