— चलते (हिलते) आसन पर (अधिकरण — समासगत); — बैठे हुए के लिए, तब (षष्ठी + अव्यय); — अथवा धीरे-धीरे (अव्यय-युग्म); — देह को हिलाने से (अपादान — समासगत); — मानसिक भाव के प्रशान्त होने पर (सति-सप्तमी — समासगत); — हे देवि! (सम्बोधन); — दिव्य-ओघ (दिव्य आनन्द-प्रवाह) — कर्म कारक — समासगत; — प्राप्त करता है (विधि लिङ्)
हे देवि! चलते (हिलते) आसन पर बैठकर, अथवा धीरे-धीरे देह को हिलाने से जब मानसिक भाव प्रशान्त हो जाए, तब (साधक) दिव्य-ओघ (दिव्य आनन्द-प्रवाह) को प्राप्त करता है। (धारणा ४८)