Vijñāna Bhairava Tantra · 1.66

Vijñāna Bhairava Tantra 1.66

1.66
चलासने स्थितस्याथ शनैर्वा देहचालनात् । प्रशान्ते मानसे भावे देवि दिव्यौघमाप्नुयात् ॥६६॥
calāsane sthitasyātha śanair vā dehacālanāt | praśānte mānase bhāve devi divyaughamāpnuyāt
anuṣṭubh
— चलते (हिलते) आसन पर (अधिकरण — समासगत) ; — बैठे हुए के लिए, तब (षष्ठी + अव्यय) ; — अथवा धीरे-धीरे (अव्यय-युग्म) ; — देह को हिलाने से (अपादान — समासगत) ; — मानसिक भाव के प्रशान्त होने पर (सति-सप्तमी — समासगत) ; — हे देवि! (सम्बोधन) ; — दिव्य-ओघ (दिव्य आनन्द-प्रवाह) — कर्म कारक — समासगत ; — प्राप्त करता है (विधि लिङ्)

हे देवि! चलते (हिलते) आसन पर बैठकर, अथवा धीरे-धीरे देह को हिलाने से जब मानसिक भाव प्रशान्त हो जाए, तब (साधक) दिव्य-ओघ (दिव्य आनन्द-प्रवाह) को प्राप्त करता है। (धारणा ४८)