— विमल (निर्मल) आकाश को (कर्म कारक); — देखता हुआ (वर्तमान कृदन्त); — दृष्टि को निरन्तर (अटूट) करके (कर्म + क्त्वान्त + विशेषण); — स्तब्ध-आत्मा, निश्चल-स्वरूप (कर्ता कारक — समासगत); — उसी क्षण (अपादान — समासगत); — हे देवि! (सम्बोधन); — भैरव-वपु, भैरव-स्वरूप (कर्म कारक); — प्राप्त करे (विधि लिङ्)
हे देवि! विमल (निर्मल) आकाश को निरन्तर (अटूट) दृष्टि से देखते हुए, स्तब्ध-आत्मा (निश्चल-स्वरूप) होकर साधक उसी क्षण भैरव-वपु (भैरव-स्वरूप) प्राप्त करता है। (धारणा ४९)