Vijñāna Bhairava Tantra · 1.67

Vijñāna Bhairava Tantra 1.67

1.67
आकाशं विमलं पश्यन्कृत्वा दृष्टिं निरन्तराम् । स्तब्धात्मा तत्क्षणाद्देवि भैरवं वपुराप्नुयात् ॥६७॥
ākāśaṃ vimalaṃ paśyan kṛtvā dṛṣṭiṃ nirantarām | stabdhātmā tatkṣaṇād devi bhairavaṃ vapur āpnuyāt
anuṣṭubh
— विमल (निर्मल) आकाश को (कर्म कारक) ; — देखता हुआ (वर्तमान कृदन्त) ; — दृष्टि को निरन्तर (अटूट) करके (कर्म + क्त्वान्त + विशेषण) ; — स्तब्ध-आत्मा, निश्चल-स्वरूप (कर्ता कारक — समासगत) ; — उसी क्षण (अपादान — समासगत) ; — हे देवि! (सम्बोधन) ; — भैरव-वपु, भैरव-स्वरूप (कर्म कारक) ; — प्राप्त करे (विधि लिङ्)

हे देवि! विमल (निर्मल) आकाश को निरन्तर (अटूट) दृष्टि से देखते हुए, स्तब्ध-आत्मा (निश्चल-स्वरूप) होकर साधक उसी क्षण भैरव-वपु (भैरव-स्वरूप) प्राप्त करता है। (धारणा ४९)