— लीन (विशेषण); — मूर्धा (शिर के अग्रभाग) में — अधिकरण; — व्योम, आकाश (कर्म कारक); — सम्पूर्ण (विशेषण); — भैरवत्व के रूप में भावना करे (करण + विधि लिङ्); — वह सब (कर्म कारक); — भैरव-आकार-तेज-तत्त्व, भैरव-स्वरूप तेजोमय तत्त्व (कर्म — समासगत); — पूर्णतः प्रविष्ट हो (विधि लिङ्)
मूर्धा (शिर के अग्रभाग) में लीन सब व्योम (आकाश) की भैरवत्व के रूप में भावना करे; (तब) वह सब भैरव-आकार-तेज-तत्त्व (भैरव-स्वरूप तेजोमय तत्त्व) में पूर्णतः प्रविष्ट हो जाता है। (धारणा ५०)