Vijñāna Bhairava Tantra · 1.68

Vijñāna Bhairava Tantra 1.68

1.68
लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं भैरवत्वेन भावयेत् । तत्सर्वं भैरवाकारतेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥६८॥
līnaṃ mūrdhni viyat sarvaṃ bhairavatvena bhāvayet | tat sarvaṃ bhairavākāratejastattvaṃ samāviśet
anuṣṭubh
— लीन (विशेषण) ; — मूर्धा (शिर के अग्रभाग) में — अधिकरण ; — व्योम, आकाश (कर्म कारक) ; — सम्पूर्ण (विशेषण) ; — भैरवत्व के रूप में भावना करे (करण + विधि लिङ्) ; — वह सब (कर्म कारक) ; — भैरव-आकार-तेज-तत्त्व, भैरव-स्वरूप तेजोमय तत्त्व (कर्म — समासगत) ; — पूर्णतः प्रविष्ट हो (विधि लिङ्)

मूर्धा (शिर के अग्रभाग) में लीन सब व्योम (आकाश) की भैरवत्व के रूप में भावना करे; (तब) वह सब भैरव-आकार-तेज-तत्त्व (भैरव-स्वरूप तेजोमय तत्त्व) में पूर्णतः प्रविष्ट हो जाता है। (धारणा ५०)