Vijñāna Bhairava Tantra · 1.69

Vijñāna Bhairava Tantra 1.69

1.69
किञ्चिज्ज्ञातं द्वैतदायि बाह्यालोकस्तमः पुनः । विश्वादि भैरवं रूपं ज्ञात्वानन्तप्रकाशभृत् ॥६९॥
kiñcijjñātaṃ dvaitadāyi bāhyālokas tamaḥ punaḥ | viśvādi bhairavaṃ rūpaṃ jñātvānantaprakāśabhṛt
anuṣṭubh
— अल्प-ज्ञात (कर्ता कारक नपुंसक) ; — द्वैत-कारक (समासगत विशेषण) ; — बाह्य आलोक, बाहरी प्रकाश (कर्ता कारक — समासगत) ; — और तमस् (अन्धकार) भी (कर्ता कारक + अव्यय) ; — विश्व आदि (कर्म कारक — समासगत) ; — भैरव-स्वरूप के रूप में (कर्म कारक) ; — जानकर (क्त्वान्त) ; — अनन्त-प्रकाश-धारी हो जाता है (समासगत विशेषण)

अल्प-ज्ञात (वस्तु) द्वैत-कारक है; बाह्य आलोक (प्रकाश) और अन्धकार भी (द्वैत-कारक हैं); विश्व आदि को भैरव-रूप जानकर (साधक) अनन्त-प्रकाश-धारी हो जाता है। (धारणा ५१)