Vijñāna Bhairava Tantra · 1.70

Vijñāna Bhairava Tantra 1.70

1.70
एवमेव दुर्निशायां कृष्णपक्षागमे चिरम् । तैमिरं भावयन्रूपं भैरवं रूपमेष्यति ॥७०॥
evam eva durniśāyāṃ kṛṣṇapakṣāgame ciram | taimiraṃ bhāvayan rūpaṃ bhairavaṃ rūpam eṣyati
anuṣṭubh
— इसी प्रकार ही (अव्यय-युग्म) ; — घोर रात्रि में, दुर्निशा में (अधिकरण कारक) ; — कृष्ण-पक्ष के आगमन पर (अधिकरण — समासगत) ; — चिर काल तक (अव्यय) ; — तैमिर (अन्धकार) को (कर्म कारक) ; — भावना करता हुआ (वर्तमान कृदन्त) ; — भैरव-रूप के रूप में (कर्म कारक) ; — (उस) रूप को प्राप्त होता है (कर्म + भविष्यत् काल)

इसी प्रकार दुर्निशा (घोर रात्रि) में, कृष्ण-पक्ष के आगमन पर, चिर काल तक तैमिर (अन्धकार) की भैरव-रूप (के रूप में) भावना करता हुआ (साधक) उस (भैरव) रूप को प्राप्त होता है। (धारणा ५२)