Vijñāna Bhairava Tantra · 1.71

Vijñāna Bhairava Tantra 1.71

1.71
एवमेव निमील्यादौ नेत्रे कृष्णाभमग्रतः । प्रसार्य भैरवं रूपं भावयंस्तन्मयो भवेत् ॥७१॥
evam eva nimīlyādau netre kṛṣṇābham agrataḥ | prasārya bhairavaṃ rūpaṃ bhāvayaṃs tanmayo bhavet
anuṣṭubh
— इसी प्रकार ही (अव्यय-युग्म) ; — पहले बन्द करके (क्त्वान्त + अधिकरण) ; — दोनों आँखों को (कर्म कारक द्विवचन) ; — काले रंग का, कृष्ण-वर्ण (कर्म कारक — समासगत) ; — सामने (अव्यय) ; — फैलाकर, प्रसारित करके (क्त्वान्त) ; — भैरव-स्वरूप (कर्म कारक) ; — भावना करता हुआ (वर्तमान कृदन्त) ; — तन्मय, तद्रूप हो जाता है — कर्ता + विधि लिङ्

इसी प्रकार पहले आँखें बन्द करके, सामने काले रंग का (शून्य-रूप) फैलाकर, भैरव-स्वरूप की भावना करता हुआ (साधक) तन्मय (तद्रूप) हो जाता है। (धारणा ५३)