Vijñāna Bhairava Tantra · 1.72

Vijñāna Bhairava Tantra 1.72

1.72
यस्य कस्येन्द्रियस्यापि व्याघाताच्च निरोधतः । प्रविष्टस्याद्वये शून्ये तत्रैवात्मा प्रकाशते ॥७२॥
yasya kasyendriyasyāpi vyāghātāc ca nirodhataḥ | praviṣṭasyādvaye śūnye tatraivātmā prakāśate
anuṣṭubh
— किसी भी इन्द्रिय का (षष्ठी एकवचन) ; — व्याघात (अवरोध) से (अपादान कारक) ; — और (अव्यय) ; — निरोध से (अपादान कारक) ; — प्रविष्ट (साधक) का — षष्ठी एकवचन ; — अद्वय-शून्य में (अधिकरण कारक) ; — वहीं ही (अव्यय-युग्म) ; — आत्मा प्रकाशित होती है — कर्ता + वर्तमान काल

किसी भी इन्द्रिय के व्याघात (अवरोध) या निरोध से अद्वय-शून्य में प्रविष्ट (साधक) के लिए वहीं (उसी स्थान पर) आत्मा प्रकाशित होती है। (धारणा ५४)