yasya kasyendriyasyāpi vyāghātāc ca nirodhataḥ |
praviṣṭasyādvaye śūnye tatraivātmā prakāśate
anuṣṭubh
— किसी भी इन्द्रिय का (षष्ठी एकवचन); — व्याघात (अवरोध) से (अपादान कारक); — और (अव्यय); — निरोध से (अपादान कारक); — प्रविष्ट (साधक) का — षष्ठी एकवचन; — अद्वय-शून्य में (अधिकरण कारक); — वहीं ही (अव्यय-युग्म); — आत्मा प्रकाशित होती है — कर्ता + वर्तमान काल
किसी भी इन्द्रिय के व्याघात (अवरोध) या निरोध से अद्वय-शून्य में प्रविष्ट (साधक) के लिए वहीं (उसी स्थान पर) आत्मा प्रकाशित होती है। (धारणा ५४)