Vijñāna Bhairava Tantra · 1.73

Vijñāna Bhairava Tantra 1.73

1.73
अबिन्दुमविसर्गं च अकारं जपतो महान् । उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥७३॥
abindum avisargaṃ ca akāraṃ japato mahān | udeti devi sahasā jñānaughaḥ parameśvaraḥ
anuṣṭubh
— बिन्दु-रहित (कर्म कारक) ; — विसर्ग-रहित (कर्म कारक) ; — और (अव्यय) ; — 'अ'-कार को (कर्म कारक) ; — जप करने वाले के लिए (षष्ठी एकवचन) ; — महान् (ज्ञान) उत्पन्न होता है (कर्ता + वर्तमान काल) ; — हे देवि! (सम्बोधन) ; — सहसा, अचानक (अव्यय) ; — ज्ञान-ओघ-स्वरूप परमेश्वर (कर्ता कारक — समासगत)

हे देवि! बिन्दु-रहित, विसर्ग-रहित 'अ'-कार का जप करने वाले के लिए सहसा महान् ज्ञान-ओघ-स्वरूप परमेश्वर का उदय होता है। (धारणा ५५)