Vijñāna Bhairava Tantra 1.74
वर्णस्य सविसर्गस्य विसर्गान्तं चितिं कुरु ।
निराधारेण चित्तेन स्पृशेद्ब्रह्म सनातनम् ॥७४॥
varṇasya savisargasya visargāntaṃ citiṃ kuru |
nirādhāreṇa cittena spṛśed brahma sanātanam
anuṣṭubh
— विसर्ग-सहित वर्ण का (षष्ठी — समासगत) ; — विसर्ग के अन्त तक (कर्म कारक — समासगत) ; — चित्ति (चैतन्य) को लगाओ (कर्म + आज्ञार्थ) ; — निराधार चित्त से (करण कारक) ; — सनातन ब्रह्म का स्पर्श करे (विधि लिङ्) विसर्ग-सहित किसी वर्ण के विसर्ग-अन्त (पर) चित्ति (चैतन्य) को लगाओ; निराधार चित्त से (साधक) सनातन ब्रह्म का स्पर्श कर लेता है। (धारणा ५६)