Vijñāna Bhairava Tantra 1.75
व्योमाकारं स्वमात्मानं ध्यायेद्दिग्भिरनावृतम् ।
निराश्रया चितिः शक्तिः स्वरूपं दर्शयेत्तदा ॥७५॥
vyomākāraṃ svam ātmānaṃ dhyāyed digbhir anāvṛtam |
nirāśrayā citiḥ śaktiḥ svarūpaṃ darśayet tadā
anuṣṭubh
— व्योम-आकार, आकाश-स्वरूप (कर्म कारक — समासगत) ; — अपने आत्मा को (कर्म कारक) ; — ध्यान करे (विधि लिङ्) ; — दिशाओं से अनावृत, अनाच्छादित (विशेषण) ; — (तब) निराश्रया, आधार-रहित (विशेषण स्त्रीलिङ्ग) ; — चिति-शक्ति, चैतन्य-शक्ति (कर्ता कारक) ; — अपना स्वरूप दिखाती है (कर्म + विधि लिङ्) ; — तब (अव्यय) अपने आत्मा को व्योम-आकार (आकाश-स्वरूप), दिशाओं से अनावृत (अनाच्छादित) ध्यान करे; तब निराश्रया चिति-शक्ति अपना स्वरूप प्रकट करती है। (धारणा ५७)