— किसी अंग को (कर्म कारक); — पहले बेधकर (क्त्वान्त + अधिकरण); — तीक्ष्ण सूई आदि से (करण कारक — समासगत); — तब, उसके बाद (अव्यय); — वहीं ही (अव्यय-युग्म); — चेतना को नियोजित करके (कर्म + क्त्वान्त); — भैरव में (अधिकरण कारक); — निर्मला गति, शुद्ध प्रवेश (कर्ता कारक)
पहले किसी अंग को तीक्ष्ण सूई आदि से कुछ बेधकर, वहीं चेतना को नियोजित करके (साधक की) भैरव में निर्मला गति (शुद्ध प्रवेश) हो जाती है। (धारणा ५८)