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Vijñāna Bhairava Tantra· 1.76 / 163

Vijñāna Bhairava Tantra1.76

1.76
किञ्चिदङ्गं विभिद्यादौ तीक्ष्णसूच्यादिना ततः । तत्रैव चेतनां युक्त्वा भैरवे निर्मला गतिः ॥७६॥
kiñcidaṅgaṃ vibhidyādau tīkṣṇasūcyādinā tataḥ | tatraiva cetanāṃ yuktvā bhairave nirmalā gatiḥ
anuṣṭubh
— किसी अंग को (कर्म कारक) ; — पहले बेधकर (क्त्वान्त + अधिकरण) ; — तीक्ष्ण सूई आदि से (करण कारक — समासगत) ; — तब, उसके बाद (अव्यय) ; — वहीं ही (अव्यय-युग्म) ; — चेतना को नियोजित करके (कर्म + क्त्वान्त) ; — भैरव में (अधिकरण कारक) ; — निर्मला गति, शुद्ध प्रवेश (कर्ता कारक)

पहले किसी अंग को तीक्ष्ण सूई आदि से कुछ बेधकर, वहीं चेतना को नियोजित करके (साधक की) भैरव में निर्मला गति (शुद्ध प्रवेश) हो जाती है। (धारणा ५८)