Vijñāna Bhairava Tantra · 1.77

Vijñāna Bhairava Tantra 1.77

1.77
चित्ताद्यन्तःकृतिर्नास्ति ममान्तर्भावयेदिति । विकल्पानामभावेन विकल्पैरुज्झितो भवेत् ॥७७॥
cittādyantaḥkṛtir nāsti mamāntar bhāvayed iti | vikalpānām abhāvena vikalpair ujjhito bhavet
anuṣṭubh
— चित्त आदि अन्तःकरण (कर्ता कारक — समासगत) ; — नहीं है (निषेधार्थ + वर्तमान) ; — मेरे भीतर (षष्ठी + अव्यय) ; — इस प्रकार भावना करे (विधि लिङ् + अव्यय) ; — विकल्पों के अभाव से (अपादान — समासगत) ; — विकल्पों से रहित हो जाए — करण + विशेषण + क्रिया

'मेरे भीतर चित्त आदि अन्तःकरण है ही नहीं' — इस प्रकार भावना करे; विकल्पों के अभाव से वह विकल्पों से रहित (मुक्त) हो जाता है। (धारणा ५९)