Vijñāna Bhairava Tantra · 1.22

Vijñāna Bhairava Tantra 1.22

1.22
कुम्भिता रेचिता वापि पूरिता वा यदा भवेत् । तदन्ते शान्तनामासौ शक्त्या शान्तः प्रकाशते ॥२२॥
kumbhitā recitā vāpi pūritā vā yadā bhavet | tadante śāntanāmāsau śaktyā śāntaḥ prakāśate
anuṣṭubh
— कुम्भित — श्वास रोकी हुई (विशेषण) ; — रेचित — श्वास बाहर निकाली हुई (विशेषण) ; — अथवा (अव्यय) ; — पूरित — श्वास भरी हुई (विशेषण) ; — या (अव्यय) ; — जब हो (विधि लिङ्) ; — उसके अन्त में (अधिकरण कारक) ; — 'शान्त' नाम से अभिहित वह (शक्ति) — कर्ता कारक ; — उस शक्ति के द्वारा (करण कारक) ; — शान्त (भैरव) — कर्ता कारक ; — प्रकाशित होता है (कर्मवाच्य वर्तमान)

कुम्भक हो, रेचक हो, या पूरक — जब भी ये अवस्थाएँ हों, उनके अन्त में 'शान्त' नामक (शक्ति) के द्वारा वह शान्त (भैरव) प्रकाशित होता है। (धारणा ४)