न व्रजेन्न विशेच्चक्तिर्मरुद्रूपा विकासिते ।
निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपता ॥२१॥
na vrajen na viśec chaktir marudrūpā vikāsite |
nirvikalpatayā madhye tayā bhairavarūpatā
anuṣṭubh
— बाहर न जाए (विधि लिङ् निषेध); — न ही भीतर आये (विधि लिङ् निषेध); — शक्ति (श्वास-रूपी) — कर्ता कारक; — वायु-स्वरूप (समासगत विशेषण); — विकसित (मध्य) अवस्था में (अधिकरण कारक); — निर्विकल्पता के द्वारा, विचार-शून्यता से (करण कारक); — मध्य में (अधिकरण कारक); — उसी से, उस (निर्विकल्पता) के द्वारा (करण कारक); — भैरव-रूपता, भैरव से तदात्म्य (कर्ता कारक — समासगत)
जब वायु-रूपी शक्ति (श्वास) न बाहर जाए और न भीतर आये — विकसित (मध्य) अवस्था में, मध्य में निर्विकल्पता के द्वारा, उसी से भैरव-रूपता (प्राप्त होती है)। (धारणा ३)