Vijñāna Bhairava Tantra · 1.20

Vijñāna Bhairava Tantra 1.20

1.20
मरुतोऽन्तर्बहिर्वापि वियद्युग्मानिवर्तनात् । भैरव्या भैरवस्येत्थं भैरवि व्यज्यते वपुः ॥२०॥
maruto'ntar bahir vāpi viyadyugmā nivartanāt | bhairavyā bhairavasyetthaṃ bhairavi vyajyate vapuḥ
anuṣṭubh
— मरुत, वायु, श्वास (कर्ता कारक) ; — अन्तर अथवा बाहर — दोनों ओर (अव्यय-समूह) ; — वियद्-युग्म — श्वास के बीच के दो शून्य-स्थान (समासगत विशेषण) ; — निवृत्त होने से, विरमित होने से (अपादान कारक) ; — भैरवी का, भैरव का (षष्ठी एकवचन) ; — इस प्रकार (अव्यय) ; — हे भैरवि! (सम्बोधन) ; — प्रकट होता है, अभिव्यक्त होता है (कर्मवाच्य वर्तमान) ; — वपु, स्वरूप, शरीर (कर्ता कारक)

अन्तर या बाहर — दोनों ओर के वियद्-युग्म (दो शून्य-स्थानों) में जब प्राण-वायु निवृत्त (विरमित) होती है, तब, हे भैरवि, इस प्रकार भैरव-भैरवी का वपु (परम स्वरूप) प्रकट होता है। (धारणा २)