— मरुत, वायु, श्वास (कर्ता कारक); — अन्तर अथवा बाहर — दोनों ओर (अव्यय-समूह); — वियद्-युग्म — श्वास के बीच के दो शून्य-स्थान (समासगत विशेषण); — निवृत्त होने से, विरमित होने से (अपादान कारक); — भैरवी का, भैरव का (षष्ठी एकवचन); — इस प्रकार (अव्यय); — हे भैरवि! (सम्बोधन); — प्रकट होता है, अभिव्यक्त होता है (कर्मवाच्य वर्तमान); — वपु, स्वरूप, शरीर (कर्ता कारक)
अन्तर या बाहर — दोनों ओर के वियद्-युग्म (दो शून्य-स्थानों) में जब प्राण-वायु निवृत्त (विरमित) होती है, तब, हे भैरवि, इस प्रकार भैरव-भैरवी का वपु (परम स्वरूप) प्रकट होता है। (धारणा २)