Vijñāna Bhairava Tantra · 1.19

Vijñāna Bhairava Tantra 1.19

1.19
भैरव उवाच । ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो विसर्गात्मा परोच्चरेत् । उत्पत्तिद्वितयस्थाने भरणाद्भरिता स्थितिः ॥१९॥
bhairava uvāca | ūrdhve prāṇo hyadho jīvo visargātmā paroccaret | utpattidvitayasthāne bharaṇād bharitā sthitiḥ
anuṣṭubh
— भैरव बोले (परोक्ष भूत) ; — ऊपर प्राण (बाहर जाती श्वास) — अधिकरण + कर्ता कारक ; — वस्तुतः, ही (निश्चयार्थ अव्यय) ; — नीचे जीव (अपान, भीतर आती श्वास) — अधिकरण + कर्ता कारक ; — विसर्ग-स्वरूप, उत्सर्जन-रूप (समासगत विशेषण) ; — 'पर' (शून्य-तत्त्व) का उच्चारण करे, उठे (विधि लिङ्) ; — दोनों उत्पत्ति-स्थानों में (अधिकरण — समासगत) ; — भरने (में स्थिर होने) से (अपादान — समासगत) ; — भरितावस्था, पूर्णता की स्थिति (कर्ता कारक)

भैरव बोले — ऊपर (बाहर निकलती हुई) प्राण है, नीचे (भीतर आती हुई) जीव (अपान) है; यह विसर्ग-स्वरूप है। (साधक) इन दोनों के उत्पत्ति-स्थानों में 'पर' (शून्य-तत्त्व) का उच्चारण करे — उन्हें भरने (में स्थिर होने) से भरितावस्था (पूर्णता) प्राप्त होती है। (धारणा १)