Vijñāna Bhairava Tantra · 1.18

Vijñāna Bhairava Tantra 1.18

1.18
यावस्था भरिताकारा भैरवस्योपलभ्यते । कैरुपायैर्मुखं तस्य परा देवी कथं भवेत् । यथा सम्यगहं वेद्मि तथा मे ब्रूहि भैरव ॥१८॥
yāvasthā bharitākārā bhairavasyopalabhyate | kair upāyair mukhaṃ tasya parā devī kathaṃ bhavet | yathā samyag ahaṃ vedmi tathā me brūhi bhairava
anuṣṭubh (extended)
— जो अवस्था (सम्बन्धवाचक स्त्रीलिङ्ग) ; — भरी हुई (पूर्णता-युक्त) आकार वाली (समासगत विशेषण) ; — भैरव में उपलब्ध होती है (कर्मवाच्य वर्तमान) ; — किन उपायों से? (करण कारक बहुवचन) ; — उसका मुख (द्वार) — कर्ता कारक ; — परा देवी (कर्ता कारक) ; — कैसे हो? (प्रश्न + विधि लिङ्) ; — जैसा मैं सम्यक् रूप से जानूँ (तुलनात्मक + वर्तमान उत्तम पुरुष एकवचन) ; — वैसा मुझे बताइए, हे भैरव! (आज्ञार्थ + सम्बोधन)

भैरव की जो भरितावस्था (पूर्णतापूर्ण अवस्था) उपलब्ध होती है, वह किन उपायों से (प्राप्त हो)? उसका मुख (द्वार) क्या है? परा देवी कैसे प्रकट होती है? हे भैरव, मुझे ऐसा बताइए जिससे मैं उसे सम्यक् रूप से जान सकूँ।