Vijñāna Bhairava Tantra · 1.17

Vijñāna Bhairava Tantra 1.17

1.17
श्रीदेव्युवाच । देवदेव त्रिशूलाङ्क कपालकृतभूषण । दिग्देशकालशून्या च व्यपदेशविवर्जिता ॥१७॥
śrīdevy uvāca | devadeva triśūlāṅka kapālakṛtabhūṣaṇa | digdeśakālaśūnyā ca vyapadeśavivarjitā
anuṣṭubh
— श्रीदेवी ने कहा (परोक्ष भूत) ; — हे देवों के देव! (सम्बोधन) ; — हे त्रिशूल-चिह्न से अंकित! (सम्बोधन — समासगत) ; — हे कपालों से विभूषित! (सम्बोधन — समासगत) ; — दिशा, देश और काल से शून्य (विशेषण — समासगत) ; — और (अव्यय) ; — व्यपदेश (नाम-निर्देश) से रहित (विशेषण — समासगत)

श्रीदेवी ने कहा — हे देवों के देव! त्रिशूल-चिह्न से अंकित, कपालों से विभूषित! (वह परम तत्त्व जो) दिशा, देश और काल से शून्य है, तथा सब व्यपदेश (नाम-निर्देश) से रहित है —