The Essence of the Tantra· 9.31 / 53

The Essence of the Tantra9.31

9.31

धरातत्त्वसिद्धिप्रदान् प्रेरयति स धरामन्त्रमहेश्वरः प्रेर्यो धरामन्त्रेशः तस्यैवाभिमानिकविग्रहतात्मको वाचको मन्त्रः साङ्ख्यादिपाशवविद्योत्तीर्णशिवविद्याक्रमेण अभ्यस्तपार्थिवयोगो ऽप्राप्तध्रुवपदः धराविज्ञानाकलः

Transliteration (IAST)

dharātattvasiddhipradān prerayati sa dharāmantramaheśvaraḥ preryo dharāmantreśaḥ tasyaivābhimānikavigrahatātmako vācako mantraḥ sāṅkhyādipāśavavidyottīrṇaśivavidyākrameṇa abhyastapārthivayogo 'prāptadhruvapadaḥ dharāvijñānākalaḥ

— धरा-तत्त्व की सिद्धि प्रदान करने वालों को ; — प्रेरित करता है ; — धरा-मन्त्रमहेश्वर ; — प्रेर्य (प्रेरित) धरा-मन्त्रेश ; — अभिमानिक विग्रहता-आत्मक (अधिष्ठातृ अहं-विग्रह रूप) ; — वाचक मन्त्र ; — सांख्य आदि पाशव-विद्या से उत्तीर्ण शिव-विद्या के क्रम से ; — पार्थिव योग का अभ्यास किये हुए ; — ध्रुव-पद को प्राप्त न किया हुआ ; — धरा-विज्ञानाकल

धरा-तत्त्व की सिद्धि प्रदान करने वालों को जो प्रेरित करता है, वह धरा-मन्त्रमहेश्वर है; प्रेर्य (प्रेरित) धरा-मन्त्रेश है; उसी की अभिमानिक विग्रहता-आत्मक वाचक मन्त्र है। जो सांख्य आदि पाशव-विद्या से उत्तीर्ण शिव-विद्या के क्रम से पार्थिव योग का अभ्यास किये हुए है किन्तु ध्रुव-पद को प्राप्त नहीं हुआ, वह धरा-विज्ञानाकल है।