The Essence of the Tantra· 8.45 / 93

The Essence of the Tantra8.45

8.45

किञ्चिज्ज्ञत्वदायिन्य् अशुद्धविद्या कलातो जाता सा च विद्या बुद्धिं पश्यति तद्गतांश् च सुखादीन् विवेकेन गृह्णाति

Transliteration (IAST)

kiñcijjñatvadāyiny aśuddhavidyā kalāto jātā sā ca vidyā buddhiṃ paśyati tadgatāṃś ca sukhādīn vivekena gṛhṇāti

— किञ्चिज्ज्ञत्व (अल्प-ज्ञातृत्व) देने वाली ; — अशुद्धविद्या (सीमित विद्या) ; — कला से उत्पन्न ; — बुद्धि को देखती है ; — उसमें गत सुख आदि को ; — विवेक से ग्रहण करती है

किञ्चिज्ज्ञत्व (अल्प-ज्ञातृत्व) देने वाली अशुद्धविद्या कला से उत्पन्न होती है। और वह विद्या बुद्धि को देखती है तथा उसमें गत सुख आदि को विवेक से ग्रहण करती है।