The Essence of the Tantra· 6.55 / 82

The Essence of the Tantra6.55

6.55

एवम् असङ्ख्याः सृष्टिप्रलयाः एकस्मिन् महासृष्टिरूपे प्राणे सो ऽपि संविदि सा उपाधौ स चिन्मात्रे चिन्मात्रस्यैव अयं स्पन्दो यद् अयं कालोदयो नाम

Transliteration (IAST)

evam asaṅkhyāḥ sṛṣṭipralayāḥ ekasmin mahāsṛṣṭirūpe prāṇe so 'pi saṃvidi sā upādhau sa cinmātre cinmātrasyaiva ayaṃ spando yad ayaṃ kālodayo nāma

— असंख्य — अगणनीय ; — सृष्टि-प्रलय (सृजन और विलय) ; — महासृष्टि-रूप एक प्राण में ; — संवित् में ; — उपाधि में ; — चिन्मात्र में (केवल चैतन्य में) ; — स्पन्द — स्पन्दन, धड़कन ; — काल-उदय — काल का उदय

इस प्रकार एक महासृष्टि-रूप प्राण में असंख्य सृष्टि-प्रलय (होते हैं); वह (प्राण) भी संवित् में, वह उपाधि में, और वह चिन्मात्र में (विश्रान्त है)। यह स्पन्द चिन्मात्र का ही है — जिसे काल-उदय कहते हैं।