The Essence of the Tantra· 22.49 / 53

The Essence of the Tantra22.49

22.49

उक्तव्याप्तिके प्राणे विश्वमये प्रोक्तसंविद्व्याप्त्या तर्पणान्नगन्धधूपादिसमर्पणेन उपोद्बलनं प्राणयागः

Transliteration (IAST)

uktavyāptike prāṇe viśvamaye proktasaṃvidvyāptyā tarpaṇānnagandhadhūpādisamarpaṇena upodbalanaṃ prāṇayāgaḥ

— उक्त व्याप्ति वाले प्राण में ; — विश्वमय ; — प्रोक्त संवित्-व्याप्ति से ; — तर्पण, अन्न, गन्ध, धूप आदि के समर्पण से ; — उपोद्बलन (दृढ़ीकरण) ; — प्राण-याग (प्राण में याग)

उक्त व्याप्ति वाले, विश्वमय प्राण में, प्रोक्त संवित्-व्याप्ति से, तर्पण, अन्न, गन्ध, धूप आदि के समर्पण से (किया जाने वाला) उपोद्बलन (दृढ़ीकरण) प्राण-याग है।