The Essence of the Tantra· 22.50 / 53

The Essence of the Tantra22.50

22.50

विश्रान्तिरूढिस् तु संविद्यागः प्राग् एव निरूपितः

Transliteration (IAST)

viśrāntirūḍhis tu saṃvidyāgaḥ prāg eva nirūpitaḥ

— किन्तु विश्रान्ति में रूढ़ि (स्थिति) ; — संवित्-याग (संवित् में याग) ; — पहले ही निरूपित किया जा चुका है

किन्तु विश्रान्ति में रूढ़ि (स्थिति) ही संवित्-याग है, जो पहले ही निरूपित किया जा चुका है।