The Essence of the Tantra· 22.18 / 53

The Essence of the Tantra22.18

22.18

कार्यहेतुसहोत्थत्वात् त्रैधं साक्षाद् अथान्यथा । कॢप्तावतो मिथो ऽभ्यर्च्य तर्प्यानन्दान्तिकत्वतः

Transliteration (IAST)

kāryahetusahotthatvāt traidhaṃ sākṣād athānyathā | kḷptāvato mitho 'bhyarcya tarpyānandāntikatvataḥ

— कार्य एवं हेतु के सह-उत्थान के कारण ; — त्रिविध रूप से ; — साक्षात्, अथवा अन्यथा (परोक्ष) ; — कॢप्त (विधिवत् संयोजित) दोनों का ; — परस्पर अभ्यर्चन करके ; — तर्पण करके ; — आनन्द की समीपता के कारण

कार्य एवं हेतु के सह-उत्थान के कारण (तादात्म्य) त्रिविध (होता है) — साक्षात्, अथवा अन्यथा (परोक्ष)। उन दोनों कॢप्त (विधिवत् संयोजित) के परस्पर अभ्यर्चन करके, तर्पण करके, आनन्द की समीपता के कारण,