The Essence of the Tantra· 21.3 / 13

The Essence of the Tantra21.3

21.3

तत्र संविन्मात्रमये विश्वस्मिन् संविदि च विमर्शात्मिकायां विमर्शस्य च शब्दनात्मकतायां सिद्धायां सकलजगन्निष्ठवस्तुनः तद्गतस्य च कर्मफलसम्बन्धवैचित्र्यस्य यत् विमर्शनं तद् एव शास्त्रम् इति परमेश्वरस्वभावाभिन्न एव समस्तः शास्त्रसन्दर्भो वस्तुत एकफलप्रापकः एकाधिकार्युद्देशेनैव तत्र तु परमेश्वरनियतिशक्तिमहिम्नैव भागे भागे रूढिः लोकानाम् इति

Transliteration (IAST)

tatra saṃvinmātramaye viśvasmin saṃvidi ca vimarśātmikāyāṃ vimarśasya ca śabdanātmakatāyāṃ siddhāyāṃ sakalajaganniṣṭhavastunaḥ tadgatasya ca karmaphalasambandhavaicitryasya yat vimarśanaṃ tad eva śāstram iti parameśvarasvabhāvābhinna eva samastaḥ śāstrasandarbho vastuta ekaphalaprāpakaḥ ekādhikāryuddeśenaiva tatra tu parameśvaraniyatiśaktimahimnaiva bhāge bhāge rūḍhiḥ lokānām iti

— संवित्-मात्रमय इस विश्व में ; — विमर्शात्मक संवित् में ; — उस विमर्श की शब्दन-आत्मकता (में) ; — सिद्ध हो जाने पर ; — सकल जगत् में निष्ठ वस्तु का ; — कर्म-फल-सम्बन्ध की विचित्रता का ; — जो विमर्शन ; — वही शास्त्र है ; — परमेश्वर के स्वभाव से अभिन्न ; — समस्त शास्त्र-सन्दर्भ ; — एक फल को प्राप्त कराने वाला ; — एक अधिकारी के उद्देश्य से ; — परमेश्वर की नियति-शक्ति के महिमा से ; — भाग-भाग में लोगों की रूढ़ि (निष्ठा)

वहाँ, संवित्-मात्रमय इस विश्व में, तथा विमर्शात्मक संवित् में, एवं विमर्श की शब्दन-आत्मकता के सिद्ध हो जाने पर, सकल जगत् में निष्ठ वस्तु का तथा उसमें रहने वाले कर्म-फल-सम्बन्ध की विचित्रता का जो विमर्शन है, वही शास्त्र है। इस प्रकार समस्त शास्त्र-सन्दर्भ परमेश्वर के स्वभाव से अभिन्न ही है, वस्तुतः एक ही फल को प्राप्त कराने वाला तथा एक ही अधिकारी के उद्देश्य से (प्रवृत्त) है। किन्तु वहाँ परमेश्वर की नियति-शक्ति के महिमा से ही लोगों की भाग-भाग में रूढ़ि (निष्ठा) होती है।