The Essence of the Tantra· 20.58 / 65

The Essence of the Tantra20.58

20.58

यद्य् अपि तत्त्वज्ञाननिष्ठस्य प्रायश्चित्तादि न किञ्चित् तथापि चर्यामात्राद् एव मोक्षभागिनः तान् अनुग्रहीतुम् आचारवर्तनीं दर्शयेत्

Transliteration (IAST)

yady api tattvajñānaniṣṭhasya prāyaścittādi na kiñcit tathāpi caryāmātrād eva mokṣabhāginaḥ tān anugrahītum ācāravartanīṃ darśayet

— तत्त्व-ज्ञान में निष्ठ (साधक) के लिए ; — प्रायश्चित्त आदि कुछ भी नहीं (है) ; — केवल चर्या-मात्र से ; — मोक्ष के भागी (साधकों) पर ; — अनुग्रह करने के लिए ; — आचार की वर्तनी (आचरण की प्रणाली) ; — दिखलानी चाहिए, प्रदर्शित करनी चाहिए

यद्यपि तत्त्व-ज्ञान में निष्ठ (साधक) के लिए प्रायश्चित्त आदि कुछ भी नहीं है, तथापि केवल चर्या-मात्र से ही मोक्ष के भागी उन (साधकों) पर अनुग्रह करने के लिए आचार की वर्तनी (प्रणाली) दिखलानी चाहिए।