The Essence of the Tantra· 18.1 / 2

The Essence of the Tantra18.1

18.1

स्वभ्यस्तज्ञानिनं साधकत्वे गुरुत्वे वा अभिषिञ्चेत् यतः सर्वलक्षणहीनो ऽपि ज्ञानवान् एव साधकत्वे अनुग्रहकरणे च अधिकृतः न अन्यः अभिषिक्तो ऽपि

Transliteration (IAST)

svabhyastajñāninaṃ sādhakatve gurutve vā abhiṣiñcet yataḥ sarvalakṣaṇahīno 'pi jñānavān eva sādhakatve anugrahakaraṇe ca adhikṛtaḥ na anyaḥ abhiṣikto 'pi

— सुअभ्यस्त ज्ञानी को (जिसने ज्ञान का भली-भाँति अभ्यास किया) ; — साधकत्व में (साधक-पद में) ; — अथवा गुरुत्व में ; — अभिषिक्त करे ; — समस्त (बाह्य) लक्षणों से हीन भी ; — ज्ञानवान् ही ; — अनुग्रह-करण में (अनुग्रह प्रदान में) ; — अधिकृत — अधिकारी ; — अन्य नहीं, अभिषिक्त होने पर भी

सुअभ्यस्त ज्ञानी को साधकत्व अथवा गुरुत्व में अभिषिक्त करे; क्योंकि समस्त (बाह्य) लक्षणों से हीन भी, यदि वह ज्ञानवान् हो, तो साधकत्व एवं अनुग्रह-करण में अधिकृत है — अन्य नहीं, अभिषिक्त होने पर भी।