The Essence of the Tantra· 16.23 / 24

The Essence of the Tantra16.23

16.23

स्ववासनाबलीयस्त्वात् भोगवासनाविच्छेदस्य च असम्भाव्यमानत्वात् बहुभिः दीक्षायाम् ऊर्ध्वशासनसंस्कारो बलवान् अन्यस् तु तत्संस्काराय स्यात्

Transliteration (IAST)

svavāsanābalīyastvāt bhogavāsanāvicchedasya ca asambhāvyamānatvāt bahubhiḥ dīkṣāyām ūrdhvaśāsanasaṃskāro balavān anyas tu tatsaṃskārāya syāt

— अपनी वासना के बलीयस्त्व (अधिक प्रबलता) के कारण ; — भोग-वासना के विच्छेद का ; — असम्भाव्यमान (असम्भव-प्राय) होने के कारण ; — दीक्षा में ; — ऊर्ध्व-शासन का संस्कार (मोक्ष की ओर) ; — बलवान् — अधिक प्रबल ; — किन्तु अन्य (भोग-अंश) ; — उस (उच्चतर लक्ष्य) के संस्कार के लिए

अपनी वासना के बलीयस्त्व (अधिक प्रबलता) के कारण, तथा भोग-वासना के विच्छेद के असम्भाव्यमान (असम्भव-प्राय) होने के कारण, बहुतों की दीक्षा में ऊर्ध्व-शासन का संस्कार बलवान् (होता है); किन्तु अन्य (भोग-अंश) तो उसके संस्कार के लिए होता है।