The Essence of the Tantra· 13.5 / 101

The Essence of the Tantra13.5

13.5

ह्रीं न फ ह्रीं ह्रीं आ क्ष ह्रीं इत्य् आभ्यां शक्तिशक्तिमद्वाचकाभ्यां मालिनीशब्दराशिमन्त्राभ्याम् एकेनैव आदौ शक्तिः ततः शक्तिमान् इति मुक्तौ पादाग्राच् छिरोऽन्तम् भुक्तौ तु सर्वो विपर्ययः

Transliteration (IAST)

hrīṃ na pha hrīṃ hrīṃ ā kṣa hrīṃ ity ābhyāṃ śaktiśaktimadvācakābhyāṃ mālinīśabdarāśimantrābhyām ekenaiva ādau śaktiḥ tataḥ śaktimān iti muktau pādāgrāc chiro'ntam bhuktau tu sarvo viparyayaḥ

— शक्ति-शक्तिमत्-वाचक दो (मन्त्रों) से ; — मालिनी एवं शब्दराशि मन्त्रों से (वर्ण-समूह मन्त्रों से) ; — किसी एक से ही ; — शक्ति ; — शक्तिमान् — शक्तिधारी ; — मुक्ति में ; — पाद-अग्र से शिर-पर्यन्त ; — भुक्ति में (भोग में) ; — सब विपर्यय — पूर्ण उल्टा क्रम

'ह्रीं न फ ह्रीं' तथा 'ह्रीं आ क्ष ह्रीं' — इन दो शक्ति-शक्तिमत्-वाचक मालिनी एवं शब्दराशि मन्त्रों से, किसी एक से ही, पहले शक्ति, फिर शक्तिमान् — इस प्रकार मुक्ति में पाद-अग्र से शिर-पर्यन्त; किन्तु भुक्ति में सब विपर्यय (उल्टा)।