The Essence of the Tantra· 13.17 / 101

The Essence of the Tantra13.17

13.17

तत्र मुमुक्षुर् उत्तराभिमुखस् तिष्ठेत् यथा भगवदघोरतेजसा झटित्य् एव प्रुष्टपाशो भवेत्

Transliteration (IAST)

tatra mumukṣur uttarābhimukhas tiṣṭhet yathā bhagavadaghoratejasā jhaṭity eva pruṣṭapāśo bhavet

— मुमुक्षु — मोक्ष-इच्छुक ; — उत्तर की ओर अभिमुख ; — खड़ा हो ; — भगवान् के अघोर-तेज से ; — शीघ्र, तत्काल ; — प्रुष्ट-पाश — जिसके बन्धन जल गये

वहाँ मुमुक्षु उत्तर की ओर अभिमुख होकर खड़ा हो, जिससे भगवान् के अघोर-तेज से शीघ्र ही प्रुष्ट-पाश (जिसके बन्धन जल गये) हो जाये।