The Essence of the Tantra· 11.9 / 25

The Essence of the Tantra11.9

11.9

सद्गुरुस् तु समस्तैतच्छास्त्रतत्त्वज्ञानपूर्णः साक्षात् भगवद्भैरवभट्टारक एव योगिनो ऽपि स्वभ्यस्तज्ञानतयैव मोचकत्वे तत्र योग्यत्वस्य सौभाग्यलावण्यादिमत्त्वस्येवानुपयोगात्

Transliteration (IAST)

sadgurus tu samastaitacchāstratattvajñānapūrṇaḥ sākṣāt bhagavadbhairavabhaṭṭāraka eva yogino 'pi svabhyastajñānatayaiva mocakatve tatra yogyatvasya saubhāgyalāvaṇyādimattvasyevānupayogāt

— सद्गुरु — सच्चा गुरु ; — समस्त इन शास्त्रों के तत्त्व-ज्ञान से पूर्ण ; — भगवान् भैरव-भट्टारक (साक्षात्) ; — सुअभ्यस्त ज्ञान से ही ; — मोचकत्व (मुक्तिदाता होने) में ; — (केवल) योग्यता का ; — सौभाग्य, लावण्य आदि के होने की भाँति ; — अनुपयोगिता के कारण

किन्तु सद्गुरु समस्त इन शास्त्रों के तत्त्व-ज्ञान से पूर्ण, साक्षात् भगवान् भैरव-भट्टारक ही है। योगी भी सुअभ्यस्त ज्ञान से ही मोचक (मुक्तिदाता) होता है, क्योंकि वहाँ योग्यता की — सौभाग्य, लावण्य आदि के होने की भाँति — अनुपयोगिता है।