The Essence of the Tantra· 11.25 / 25

The Essence of the Tantra11.25

11.25

तत्रापि इच्छावैचित्र्यात् तिरोभूतो ऽपि स्वयं वा शक्तिपातेन युज्यते मृतो वा बन्धुगुर्वादिकृपामुखेन इत्य् एवं कृत्यभागित्वं स्वात्मनि अनुसन्दधत् परमेश्वर एव इति न खण्डितम् आत्मानं पश्येत्

Transliteration (IAST)

tatrāpi icchāvaicitryāt tirobhūto 'pi svayaṃ vā śaktipātena yujyate mṛto vā bandhugurvādikṛpāmukhena ity evaṃ kṛtyabhāgitvaṃ svātmani anusandadhat parameśvara eva iti na khaṇḍitam ātmānaṃ paśyet

— इच्छा-वैचित्र्य से ; — तिरोभूत — आच्छादित हुआ ; — स्वयं अथवा शक्तिपात से युक्त होता है ; — मृत (होने पर) ; — बन्धु, गुरु आदि की कृपा के मुख से ; — कृत्य-भागित्व (पाँच कृत्यों में भागीदारी) ; — अपने आत्मा में अनुसन्धान करता हुआ ; — परमेश्वर ही ; — खण्डित आत्मा को न देखे

वहाँ भी इच्छा-वैचित्र्य से तिरोभूत हुआ भी स्वयं अथवा शक्तिपात से युक्त होता है, अथवा मृत होने पर बन्धु, गुरु आदि की कृपा के मुख से। इस प्रकार अपने आत्मा में कृत्य-भागित्व का अनुसन्धान करता हुआ परमेश्वर ही (है) — इस प्रकार खण्डित आत्मा को न देखे।