The Essence of the Tantra· 12.1 / 10

The Essence of the Tantra12.1

12.1

दीक्षादिकं वक्तव्यम् इति उक्तम् अतो दीक्षास्वरूपनिरूपणार्थं प्राक् कर्तव्यं स्नानम् उपदिश्यते

Transliteration (IAST)

dīkṣādikaṃ vaktavyam iti uktam ato dīkṣāsvarūpanirūpaṇārthaṃ prāk kartavyaṃ snānam upadiśyate

— दीक्षा आदि ; — कहना चाहिए ; — दीक्षा के स्वरूप-निरूपण के लिए ; — पहले, पूर्व में ; — किये जाने योग्य ; — स्नान — स्नान/आचमन ; — उपदिष्ट किया जाता है

दीक्षा आदि कहना चाहिए — ऐसा कहा गया। अतः दीक्षा के स्वरूप-निरूपण के लिए पहले किये जाने योग्य स्नान का उपदेश किया जाता है।