Stanzas on the Divine Pulsation · 3.8

Stanzas on the Divine Pulsation 3.8

3.8
ग्लानिर्विलुण्ठिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः । तदुन्मेषविलुप्तं चेत्कुतः सा स्यादहेतुका ॥८॥
glānir viluṇṭhikā dehe tasyāś cājñānataḥ sṛtiḥ | tad-unmeṣa-viluptaṃ cet kutaḥ sā syād ahetukā ||
anuṣṭubh
— ग्लानि — खिन्नता, अवसाद, दैन्य (कर्ता कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — विलुण्ठिका — लुटेरा, अपहारक (स्त्रीलिङ्ग) ; — देह में — पु.अधि. एक. ; — उस (ग्लानि) का — स्त्री.षष्ठी एक. ; — और (अव्यय) ; — अज्ञान से (अव्यय) ; — सृति — निकलना, उद्भव (कर्ता कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — उस (स्पन्द) के उन्मेष से विलुप्त — नष्ट (कर्ता कारक — समासगत) ; — यदि (शर्तार्थक अव्यय) ; — कहाँ से? (अर्थात् कहीं से नहीं) — प्रश्नवाचक अव्यय ; — वह (ग्लानि) — स्त्री.कर्ता एक. ; — हो, हो सकता है (विधिलिङ्ग, तृ.पु.एक. √अस्) ; — अहेतुक — कारण-रहित (विशेषण, स्त्रीलिङ्ग)

ग्लानि (दैन्य) देह का लुटेरा है, और वह अज्ञान से उत्पन्न होती है; यदि वह (अज्ञान) उस (स्पन्द) के उन्मेष से नष्ट हो जाए, तो वह (ग्लानि) बिना कारण के कैसे रह सकती है?