स्थिरत्वं क्षणिकत्वं च प्रमाणां चिन्तया स्थितम् ।
अप्यसंवादरूपं च विरुद्धं तत्कथं भवेत् ॥९४॥
sthiratvaṃ kṣaṇikatvaṃ ca pramāṇāṃ cintayā sthitam |
apyasaṃvādarūpaṃ ca viruddhaṃ tatkathaṃ bhavet
(यदि कहो कि) स्थिरत्व और क्षणिकत्व (दोनों) प्रमाणों के विचार से स्थित हैं — (तो भी) परस्पर असंवादी (विसंगत) और विरुद्ध-रूप होकर वह (दोनों एक साथ) कैसे हो (जब तक एक चित् में समाहित न हों)?