मिथ्यात्वं क्रियते कस्य किं काले यत्र तद्भवेत् ।
काल एव स न भवेदिति चेन्नैव कुत्रचित् ॥१५॥
mithyātvaṃ kriyate kasya kiṃ kāle yatra tadbhavet |
kāla eva sa na bhavediti cennaiva kutracit
किसकी मिथ्यात्व किया जाता है, और किस काल में, जहाँ वह हो? यदि (कहो कि) 'वह काल ही न हो' (अतः मिथ्याकरण कभी नहीं होता) — (तो उत्तर) वह (मिथ्याकरण) कहीं भी नहीं होता।