The Vision of Śiva· 3.21 / 99

The Vision of Śiva3.21

3.21
इत्युक्तेऽत्र समाक्षेपः पक्षस्यास्य विधीयते । आदौ तावद्विकारित्वं शिवतत्त्वस्य जायते ॥२१॥
ityukte'tra samākṣepaḥ pakṣasyāsya vidhīyate | ādau tāvadvikāritvaṃ śivatattvasya jāyate
— इस प्रकार कहे जाने पर ; — यहाँ ; — आक्षेप ; — इस पक्ष के विरुद्ध ; — उठाया जाता है ; — सर्वप्रथम ; — आरम्भ में ; — विकारित्व ; — शिव-तत्त्व का ; — उत्पन्न होता है

इस प्रकार कहे जाने पर यहाँ इस पक्ष के विरुद्ध आक्षेप उठाया जाता है: सर्वप्रथम तो शिव-तत्त्व का विकारित्व उत्पन्न होता है (यदि वह वास्तव में जगत् बन जाता है)।