इत्युक्तेऽत्र समाक्षेपः पक्षस्यास्य विधीयते ।
आदौ तावद्विकारित्वं शिवतत्त्वस्य जायते ॥२१॥
ityukte'tra samākṣepaḥ pakṣasyāsya vidhīyate |
ādau tāvadvikāritvaṃ śivatattvasya jāyate
इस प्रकार कहे जाने पर यहाँ इस पक्ष के विरुद्ध आक्षेप उठाया जाता है: सर्वप्रथम तो शिव-तत्त्व का विकारित्व उत्पन्न होता है (यदि वह वास्तव में जगत् बन जाता है)।