The Vision of Śiva· 2.45 / 90

The Vision of Śiva2.45

2.45
अविभागा कथं सा स्याद्यतः पश्यन्त्यसौ स्मृता ॥४५॥
avibhāgā kathaṃ sā syādyataḥ paśyantyasau smṛtā
— अविभागा ; — कैसे ; — वह ; — हो सके ; — क्योंकि ; — 'पश्यन्ती' (देखने वाली) ; — वह ; — कही गई है

— किन्तु वह 'अविभागा' कैसे हो सकती है, जबकि वह 'पश्यन्ती' (देखने वाली) कही गई है (और देखने में द्रष्टा-दृश्य का विभाग निहित है)?