The Vision of Śiva· 2.10 / 90

The Vision of Śiva2.10

2.10
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥१०॥
na so'sti pratyayo loke yaḥ śabdānugamādṛte | śabdabrahmaṇi niṣṇātaḥ paraṃ brahmādhigacchati
— नहीं ; — वह है ; — प्रत्यय (ज्ञान) ; — लोक में ; — जो ; — शब्द के अनुगम के बिना ; — शब्द-ब्रह्म में ; — निष्णात ; — परम ब्रह्म ; — प्राप्त करता है

(वे कहते हैं:) 'लोक में ऐसा कोई प्रत्यय (ज्ञान) नहीं जो शब्द के अनुगम के बिना हो; शब्द-ब्रह्म में निष्णात पुरुष परम ब्रह्म को प्राप्त करता है।'