Parātrīśikā· 1.8 / 36

Parātrīśikā1.8

1.8
अमूला तत्क्रमा ज्ञेया क्षान्ता सृष्टिर् उदाहृता । सर्वेषां चैव मन्त्राणां विद्यानां च यशस्विनि ॥८॥
amūlā tatkramā jñeyā kṣāntā sṛṣṭir udāhṛtā | sarveṣāṃ caiva mantrāṇāṃ vidyānāṃ ca yaśasvini
— मूलरहित — बिना मूल के (अकार, 'मूलहीन' स्वर से आरम्भ) ; — उसी क्रम वाली (अ … क्ष) ; — जाननी चाहिए ; — 'क्ष' पर अन्त होने वाली ; — सृष्टि — अक्षरों का उद्भव-क्रम (वर्णों का ब्रह्मांडीय उद्गार) ; — कही गई, उदाहृत है ; — समस्त की ; — और निश्चय ही (च + एव) ; — मन्त्रों की ; — विद्याओं की — (स्त्रीलिंग मन्त्र/ज्ञान-सूत्र) ; — और ; — हे यशस्विनि — कीर्तिमती

मूलरहित, उसी क्रम वाली, 'क्ष' पर अन्त होने वाली — यह सृष्टि (अक्षर-उद्भव) जाननी चाहिए, जो हे यशस्विनि, समस्त मन्त्रों और विद्याओं की (उत्पत्ति-स्रोत) कही गई है।