Parātrīśikā· 1.9 / 36

Parātrīśikā1.9

1.9
इयं योनिः समाख्याता सर्वतन्त्रेषु सर्वदा । चतुर्दशयुतं भद्रे तिथीशान्तसमन्वितम् । तृतीयम् ब्रह्म सुश्रोणि हृदयम् भैरवात्मनः ॥९॥
iyaṃ yoniḥ samākhyātā sarvatantreṣu sarvadā | caturdaśayutaṃ bhadre tithīśāntasamanvitam | tṛtīyam brahma suśroṇi hṛdayam bhairavātmanaḥ
— यह ; — योनि — गर्भ, स्रोत ; — भली प्रकार कही गई, घोषित ; — समस्त तन्त्रों में ; — सदा ; — चौदहवें (स्वर औ) से युक्त ; — हे भद्रे — मंगलमयी ; — तिथीश के अन्त (विसर्ग ः) से समन्वित ; — तृतीय — तीसरा (बीज/ब्रह्म) ; — ब्रह्म — यहाँ पवित्र बीजाक्षर ; — हे सुश्रोणि — सुन्दर श्रोणि वाली ; — हृदय — सार, बीज (सौः) ; — भैरव-स्वरूप का — जिसका स्वभाव भैरव है

यह योनि समस्त तन्त्रों में सदा भली प्रकार कही गई है। हे भद्रे, चौदहवें (स्वर औ) से युक्त, तिथीश के अन्त (विसर्ग) से समन्वित — हे सुश्रोणि, यह तृतीय ब्रह्म ही भैरव-स्वरूप का हृदय है।