ईश्वरो बहिर् उन्मेषो निमेषो ऽन्तः सदाशिवः
सामानाधिकरण्यं च सद्विद्याहमिदंधियोः ॥३॥
īśvaro bahir unmeṣo nimeṣo 'ntaḥ sadāśivaḥ
sāmānādhikaraṇyaṃ ca sadvidyāhamidaṃdhiyoḥ
— ईश्वर; — बाह्य; — उन्मेष — विस्तार, खुलना; — निमेष — संकोच, मुँदना; — आन्तरिक; — सदाशिव; — सामानाधिकरण्य — एक अधिकरण में होना; — और; — सद्विद्या में 'अहम्' और 'इदम्' ज्ञानों का
ईश्वर बाह्य उन्मेष (विस्तार) है, सदाशिव आन्तरिक निमेष (संकोच) है; और 'अहम्' तथा 'इदम्' इन ज्ञानों का सामानाधिकरण्य (एक अधिकरण में होना) सद्विद्या में (है)।