Verses on the Recognition of the Lord· 10.2 / 7

Verses on the Recognition of the Lord10.2

10.2
तत्रैकम् आन्तरं तत्त्वं तद् एवेन्द्रियवेद्यताम् संप्राप्यानेकतां याति देशकालस्वभावतः ॥२॥
tatraikam āntaraṃ tattvaṃ tad evendriyavedyatām saṃprāpyānekatāṃ yāti deśakālasvabhāvataḥ
— इनमें, उस विषय में ; — एक ; — आन्तरिक ; — तत्त्व ; — वही ; — इन्द्रिय-वेद्यता को ; — प्राप्त करके (पूर्वकालिक क्रिया, √आप्+सम्-प्र) ; — अनेकता को ; — जाता है, प्राप्त होता है (√या) ; — देश और काल के स्वभाव से

इनमें एक आन्तरिक तत्त्व ही, वही, इन्द्रिय-वेद्यता को प्राप्त होकर, देश और काल के स्वभाव से अनेकता को प्राप्त हो जाता है।