Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.21 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.21

9.21
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ ९-२१ ॥
traividyā māṃ somapāḥ pūtapāpā yajñairiṣṭvā svargatiṃ prārthayante | te puṇyamāsādya surendraloka- maśnanti divyāndivi devabhogān || 9-21 ||
— तीनों वेदों के ज्ञाता, सोमपान करने वाले ; — पाप से पवित्र, यज्ञों से पूजकर ; — स्वर्ग की गति की प्रार्थना करते हैं ; — वे पुण्य से इन्द्रलोक पाकर स्वर्ग में दिव्य देवभोग भोगते हैं

तीनों वेदों के ज्ञाता, सोमपान करने वाले, पाप से पवित्र हुए लोग यज्ञों से मुझे पूजकर स्वर्ग की गति की प्रार्थना करते हैं; वे पुण्य से इन्द्रलोक को प्राप्त करके स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोगों को भोगते हैं।